आसाराम बापू, जिन्हें उनके अनुयायी संत श्री आसारामजी बापू कहते हैं, भारत के एक चर्चित आध्यात्मिक गुरु रहे हैं। उनका जन्म 17 अप्रैल 1941 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान में) के एक साधारण सिंधी परिवार में हुआ था। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार गुजरात आकर बस गया। उनका वास्तविक नाम आसुमल सिरुमलानी हरपलानी था।
उन्होंने बचपन में काफी कठिन परिस्थितियाँ देखीं और बाद में आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर हुए। उन्होंने कई संतों और गुरुओं के सान्निध्य में साधना की और 1970 के दशक में स्वयं को एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्थापित किया। आसाराम बापू ने भारत के कई शहरों में आश्रम स्थापित किए, जिनमें अहमदाबाद, हरिद्वार, जोधपुर, इंदौर, सूरत और दिल्ली शामिल हैं।
उनके प्रवचन खासकर युवाओं को ब्रह्मचर्य, संयम, सेवा और सनातन धर्म के सिद्धांतों का पालन करने की प्रेरणा देते थे। वे गीता, रामायण और वेदों का प्रचार करते हुए एक सादा जीवन और उच्च विचारों का संदेश देते थे। उनका कहना था कि आत्मा की शक्ति को पहचानो और स्वयं को परमात्मा से जोड़ो।
सालों तक वे एक लोकप्रिय संत के रूप में उभरे, और उनके करोड़ों अनुयायी भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी थे। उन्होंने कई सामाजिक कार्य भी किए, जैसे कि नशामुक्ति अभियान, गौसेवा, निर्धन लोगों की सहायता, और धार्मिक शिक्षा का प्रचार।
लेकिन वर्ष 2013 में उनका नाम एक गंभीर विवाद में आया। जोधपुर की एक किशोरी ने उनके खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया, जिससे उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। कई महीनों की पूछताछ और जांच के बाद उन्हें जेल भेजा गया और उनका ट्रायल शुरू हुआ।
2018 में जोधपुर कोर्ट ने आसाराम बापू को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई। यह फैसला समाज में एक बड़ी चर्चा का विषय बना क्योंकि यह पहली बार था जब इतने बड़े स्तर के किसी धर्मगुरु को ऐसी सजा मिली। उनकी गिरफ्तारी और सजा ने उनके अनुयायियों को झकझोर कर रख दिया।
आज भी उनके अनुयायी उन्हें निर्दोष मानते हैं और उनके आश्रमों में नियमित रूप से धार्मिक क्रियाकलाप होते रहते हैं। वहीं कानून व्यवस्था और न्यायपालिका ने इस मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
आसाराम बापू का जीवन भारत में आस्था और आध्यात्मिकता का एक बड़ा अध्याय था, लेकिन विवादों ने उनके पूरे व्यक्तित्व को धुंधला कर दिया। वे एक समय में लाखों लोगों के लिए गुरु और मार्गदर्शक थे, लेकिन कानून के सामने सभी एक समान होते हैं — यह सिद्धांत उनके मामले में भी लागू हुआ।

